Thursday, October 27, 2011

ये कौनसी दुनिया है



आँसू  आते  नहीं  पलकों  पे
बात  आती  नहीं  जुबान  पे
ये  कौनसी  दुनिया  है
यकीन  रहा  ना  मेरा  खुद  पे

घिरी  हुई  हु  अज्नबीओ  से
दूर  हो  रही  हु  अपने  आप  से
ये  कौनसी  दुनिया  है
पहचान  खो  रही  मेरी  मुझसे

ये  तो  सोचा  ना  था  खयालो  में
उड़ान  भरी  थी   कल्पनाओ  में
ये  कौनसी  दुनिया  है
कुछ  और  ही  है  यहाँ  हकीकत  में

भूल  रही  हु  जीना  खुल  के
वक़्त  बिताना  साथ  अपनों  के
ये  कौनसी  दुनिया  है
सांया  भी  चल  पड़ा  मुझे  छोड़  के

Saturday, June 4, 2011

हार और जीत



जीत  है  जीवन  का  एक  नया  दिन 
अधुरा  है  संसार  इसके  बिन 

हार  लेकर  आता  है  अंधकार 
पर  इसके  बिन  सपने   नहीं  होते   साकार   

दिन  रत  का  आना  जाना  स्वाभाविक 
यह  बात  तू  जन  ले  ओ  नाविक 

जिसने  हार  का  मुख  न  देखा 
वह  कैसे  पार  करेगा  जीत  की  रेखा 

पराजय  के  बिन  विजय  का  आनंद   अधुरा 
ये दोनों  न  मिले  तो  जीवन  का  सार  न  पूरा 

जो  हार  देख  घबरा  गया 
लक्ष्य  पथ  छोड़  कर   भाग  गया 

उसे  जय  की  ख़ुशी  न  मिले 
जीवन  के  आँगन  में  फूल  न  खिले 

जीत  प्राप्त  करने  हार  को  अपनाना  होगा 
हार  और  जीत जीवन  के  दो  पहलु  है  ,समझाना  होगा