Saturday, November 20, 2010
Mohhabbat
Thursday, September 30, 2010
एक अन्त, एक शुरुआत
Friday, September 24, 2010
प्रकृति और मानव
मनुष्य को अपनी उन्ग्ली पे नचाती है
कभी बनाती पानी को ओस
तो कभी पानी के लिये चलना पडता कई कोस
कभी माटी उगाती है सोना
तो कभी कृषि को पडता है रोना
कभी भव्रा फूल पर मनडराता है
तो कभी कोई फूल किसी जीव को चूस खाता है
बरसात कई बार देता है जीवन
तो कई बार यही डूबा देता है भवन
नदी कलरव करती बहती सदेव
इन्मे हलचल होने से मचल्ते है त्रिदेव
अम्बर प्रदान करता छत्र छाया हमे
पर बिजली की कडकडआहट किसे रमे
दीपक अन्धकार करता है दूर
पर आग दिखती है अपना रूप क्रूर
पर जब् प्रकृति पर होता है अत्याचार
तो वो भी मनुष्य जाती पर करती है वार
ज्ञब् कई पेड गिराये जाते है
तो मानव नरक को पाते है
ज्ञब् गन्दगी पानी मे करती है वास
तो उसे पीकर मानव का होता है नास
हवा मे जब् धूये की मात्रा अधिक होती है
तब् इन्सान के भविष्य की रात होती है
ज्ञब् शहरो मे ध्वनि का हो राज
तब् खोखला लगता है सब् सजावट साज
मनुष्य विजय हुआ सब् पर
पर हार गया वह् प्रकृति के तट पर
उड्ता है , दौडता है , तैरता है अवश्य
पर धरती पर चल सकता नही मनुष्य ….
Sunday, August 1, 2010
भाई

बचपन मे हम सिर्फ़ लडाईयान करते
एक दूसरे की हमेशा करते शिकायत
आज मेरी हर गलती पर डाट नही ,
मिलती है उससे नासियत
हमारी नोक -झोक की आवाज़ से
गून्ज्ती रेह्ती थी गलियान
आज जो रास्ते मे काटे आये
खिला दे वो वहा भी कलियान
उन मीठई मीठई टक्ररारो से ही
मजबूत हुआ हमारा रिश्ता
मेरे जीवन मे उसकी जगह है
जैसे आसमान से आया कोइ फ़रिश्ता
मेरा सबसे अच्छा दोस्त
सर्व -प्रथम और सर्व -श्रेष्ट गुरु
आज मेरी जो शक्सियत है
कहनी उसिसे हुइ थी शुरु
आज मेरे अस्तित्व की
नीव है जिसने बनाई
मेरी पेह्चन है जिसकी वजह् से
वो है मेरा प्यारा भाई
Sunday, July 11, 2010
भविष्य

एक दिन घर पर मैं अकेली थी
अंधकार में जल रही थी सिर्फ एक ज्योत
और मेरे मन में उठ रहा था एक भंवर
भविष्य केन्द्रित ख्यालो से ओतप्रोत
तभी मन मैं उठा एक विचार ,क्या
मुझे भागी बनना है उस दौर में
जहा मोल है सिर्फ पैसे का , मानवीय
भावना है दुनिया से परे
या उठानी है घर की जिम्मेदारिया
माँ एवंग दादी माँ की तरह
खुद का अस्तित्व भूल कर जो , आश्रित
रहती है वल्लारियो की तरह
चुनाव करना था कठिन
असमंजस्य में डूबा था दिल
क्या है सही और कौन गलत
कोई मंजिल नहीं रही थी मिल
तभी ध्यान गया उस शिखा की और
जो खुद जल कर ,दे रहे थी उजाला
जिसकी थी स्वयं की अस्मिता
जिसने अंधकार को भी पला
शायद मिल गया था मुझे उत्तर
समन्वय करना था दोनों का
बहार निकलने से बनती है पहचान
कर्त्तव्य पालन है अंश जीवन का
अथ : यह निश्चय हुआ की मर्दों की इस
दुनिया का , बनना था मुझे अंग
और परम्पराओ की बेडियों से
चलती रहेगी जंग .
Saturday, June 12, 2010
सपना
घर आते हि हुइ मै निद्रा मे मस्त
ज्योन हि मैने आन्खेन बन्द की
किसी ने मेरे खयलो मे दस्तक दी
उसका चेहरा धुन्दला धुन्द्ला सा था
समज मे नही आया उसे कहा देखा था
वह मेरी तरफ़् बढा आ रहा था
मेरे दिल को सेहलआ रहा था
ज्ञब् उसने मेरा हाथ् थामा
तो ऐसा लगा मिल गया मुज्हे सारा खज़ाना
फ़िर् जब् हम लगे घुमने
तो मेरी नीन्द उडा दी तुमने
नीन्द खुलने पर अचंभा हुआ
मैने रब् से मागी दुआ
अगली रात के लिये मै बेकरार हुइ
झट झट बीतेन घडी की सुइ
Sunday, May 16, 2010
दिल ढूढ़ रहा है
एक ख्वाहिश होती है
कब मुलाकात होगी उससे
दुनिया जिसकी सिर्फ हमसे होती है
दिन रात ये पलके हमारी
ढूंढती रहती है उस परछाई को
जिसके आने की आहात ही
छु जाये दिल की हरगहराई को
कोई तो होगा इस दुनिया में
जिसे देख मुस्कुराये ये नज़रें
आँखों में जो नमी आये
चुरा ले वोह उसे अपने लव्सो से
इंतज़ार में विचलित है
ये दिल , ये धड़कन , ये सांसें
शरीर से रूह छूटने को है
अब तो बस उसकी आंस में
ये दिल ढूंढ रहा है
हर लम्हा , हर पल , हर घडी
जिसके ख्वाबो को संजोया है
उसकी मूरत कब सामने होगी खड़ी
Saturday, April 24, 2010
दोस्ती
जब तुम अकेले होते हो
किसी का नहीं होता सहारा
एक दोस्त की कमी मेहसूस होती है
तनहा लगता है जग सारा
कोई पास रहे या न रहे
दोस्त का सदा होता है साथ
कोई चाहे करे न विश्वास
कंधे पर रहता है दोस्त का हाथ
अकेले होते है कुछ काज
पूर्ण होते है वोह साथ दोस्त के
यह दिन तो हो जाये पार
दोस्ती से ख़ुशी आये हर दिन में
एक यार बिना जीवन अधुरा
अगर दोस्त नहीं तो जीना है व्यर्थ
सुच दुःख में साथ देना
एक सचे साथी का है अर्थ
किसी दोस्त पर मरना नहीं मुश्किल
परन्तु ऐसा दोस्त ढूँढना
जिस पर जान दी जाये
उन्हें है कठिन चुनना
दोस्ती की है वाही व्याख्या
स्वार्थ का नहीं जिसमे स्थान
एक दुसरे की परेशानी समझे
उसे सुलझा , फिर गए प्रेम गान .
Saturday, April 17, 2010
जुदाई
Saturday, April 10, 2010
यह ज़िन्दगी क्या है ??
यह ज़िन्दगी क्या है ?
ये बात किसी की समझ में न आई
कोई कहता है इसे विशाल पर्वत
तो कोई छोटी सी राइ ;
यह ज़िन्दगी क्या है ?
ये तो है कोई पहेली
जिसने इसे सुलझा दिया
उसने अपनी दुनिया जी ली ;
यह ज़िन्दगी क्या है ?
ये है एक विशाल मेला
इसमें कई लोग आते जाते है
कुछ साथियो के साथ तो कोई अकेला ;
यह ज़िन्दगी क्या है ?
ये है किसी रेलगाड़ी का सफ़र
किसका साथ कितना रहे
ये आश्रित है ,मुसाफिरों के आने जाने पर ;
यह ज़िन्दगी क्या है ?
ये खेल है एक शतरंज का
जिसकी चल अधिक सटीक
वो हो जाये हक़दार जीत का ;
यह ज़िन्दगी क्या है ?
ये है विचारो का समझोता
जो इसके आधार पे चले वो सुखी
इसका उलंघन करने पर , वह अंत में रोता ;
यह ज़िन्दगी क्या है ?
इस बात का जिसने उत्तर पाया
उसकी रूह हो जाए अमर
भले ही , मिटटी में मिले उसकी काया ........