Saturday, June 12, 2010

सपना

आज का दिन था थकान से ग्रस्त
घर आते हि हुइ मै निद्रा मे मस्त

ज्योन हि मैने आन्खेन बन्द की
किसी ने मेरे खयलो मे दस्तक दी

उसका चेहरा धुन्दला धुन्द्ला सा था
समज मे नही आया उसे कहा देखा था

वह मेरी तरफ़् बढा आ रहा था
मेरे दिल को सेहलआ रहा था

ज्ञब् उसने मेरा हाथ् थामा
तो ऐसा लगा मिल गया मुज्हे सारा खज़ाना

फ़िर् जब् हम लगे घुमने
तो मेरी नीन्द उडा दी तुमने

नीन्द खुलने पर अचंभा हुआ
मैने रब् से मागी दुआ

अगली रात के लिये मै बेकरार हुइ
झट झट बीतेन घडी की सुइ