
एक दिन घर पर मैं अकेली थी
अंधकार में जल रही थी सिर्फ एक ज्योत
और मेरे मन में उठ रहा था एक भंवर
भविष्य केन्द्रित ख्यालो से ओतप्रोत
तभी मन मैं उठा एक विचार ,क्या
मुझे भागी बनना है उस दौर में
जहा मोल है सिर्फ पैसे का , मानवीय
भावना है दुनिया से परे
या उठानी है घर की जिम्मेदारिया
माँ एवंग दादी माँ की तरह
खुद का अस्तित्व भूल कर जो , आश्रित
रहती है वल्लारियो की तरह
चुनाव करना था कठिन
असमंजस्य में डूबा था दिल
क्या है सही और कौन गलत
कोई मंजिल नहीं रही थी मिल
तभी ध्यान गया उस शिखा की और
जो खुद जल कर ,दे रहे थी उजाला
जिसकी थी स्वयं की अस्मिता
जिसने अंधकार को भी पला
शायद मिल गया था मुझे उत्तर
समन्वय करना था दोनों का
बहार निकलने से बनती है पहचान
कर्त्तव्य पालन है अंश जीवन का
अथ : यह निश्चय हुआ की मर्दों की इस
दुनिया का , बनना था मुझे अंग
और परम्पराओ की बेडियों से
चलती रहेगी जंग .