प्रकृति भी क्या खेल रचाती है
मनुष्य को अपनी उन्ग्ली पे नचाती है
कभी बनाती पानी को ओस
तो कभी पानी के लिये चलना पडता कई कोस
कभी माटी उगाती है सोना
तो कभी कृषि को पडता है रोना
कभी भव्रा फूल पर मनडराता है
तो कभी कोई फूल किसी जीव को चूस खाता है
बरसात कई बार देता है जीवन
तो कई बार यही डूबा देता है भवन
नदी कलरव करती बहती सदेव
इन्मे हलचल होने से मचल्ते है त्रिदेव
अम्बर प्रदान करता छत्र छाया हमे
पर बिजली की कडकडआहट किसे रमे
दीपक अन्धकार करता है दूर
पर आग दिखती है अपना रूप क्रूर
पर जब् प्रकृति पर होता है अत्याचार
तो वो भी मनुष्य जाती पर करती है वार
ज्ञब् कई पेड गिराये जाते है
तो मानव नरक को पाते है
ज्ञब् गन्दगी पानी मे करती है वास
तो उसे पीकर मानव का होता है नास
हवा मे जब् धूये की मात्रा अधिक होती है
तब् इन्सान के भविष्य की रात होती है
ज्ञब् शहरो मे ध्वनि का हो राज
तब् खोखला लगता है सब् सजावट साज
मनुष्य विजय हुआ सब् पर
पर हार गया वह् प्रकृति के तट पर
उड्ता है , दौडता है , तैरता है अवश्य
पर धरती पर चल सकता नही मनुष्य ….