
एक दिन घर पर मैं अकेली थी
अंधकार में जल रही थी सिर्फ एक ज्योत
और मेरे मन में उठ रहा था एक भंवर
भविष्य केन्द्रित ख्यालो से ओतप्रोत
तभी मन मैं उठा एक विचार ,क्या
मुझे भागी बनना है उस दौर में
जहा मोल है सिर्फ पैसे का , मानवीय
भावना है दुनिया से परे
या उठानी है घर की जिम्मेदारिया
माँ एवंग दादी माँ की तरह
खुद का अस्तित्व भूल कर जो , आश्रित
रहती है वल्लारियो की तरह
चुनाव करना था कठिन
असमंजस्य में डूबा था दिल
क्या है सही और कौन गलत
कोई मंजिल नहीं रही थी मिल
तभी ध्यान गया उस शिखा की और
जो खुद जल कर ,दे रहे थी उजाला
जिसकी थी स्वयं की अस्मिता
जिसने अंधकार को भी पला
शायद मिल गया था मुझे उत्तर
समन्वय करना था दोनों का
बहार निकलने से बनती है पहचान
कर्त्तव्य पालन है अंश जीवन का
अथ : यह निश्चय हुआ की मर्दों की इस
दुनिया का , बनना था मुझे अंग
और परम्पराओ की बेडियों से
चलती रहेगी जंग .
7 comments:
इस बात में कोई दो राय नहीं कि यह दुनिया मर्दों द्वारा निर्मित है, जिसका पोषण महिलाओं ने किया है। इस बात पर बहस हो सकती है कि महिलाओं की मजबूरी थी, लेकिन महिलाओं को कम से कम अब तो स्त्रियों पर अत्याचार नहीं करने चाहिये और साथ ही साथ उन्हें पुरुषों के प्रति प्रतिशोध का भाव भी नहीं रखना चाहिये, जैसा कि अनेकों दहेज प्रकरणों में देखने को मिल रहा है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात से सहमत हँू कि संसार में यदि किसी एक वर्ग के सबसे अधिक मानव अधिकारों का हनन होता है तो वो स्त्री के अधिकारों का होता है। जिसमें पुरुषों के साथ-साथ स्त्री भी बराबर की हिस्सेदार है। स्थिति को बदलने के लिये आपकी कविता में लिया गया निर्णय ही रोशनी दिखा सकता है। अच्छी रचना लिखी है। धन्यवाद।
शुभकामनाओं सहित आपका
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश
सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३५६ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
तलाश जिन्दा लोगों की ! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!
काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।
ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।
इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।
अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।
आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-
सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?
जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
bahut umda abhivyakti hai...!!
इस नए और सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
acche bhaavon ke saath ek acchhe sandesh vaali vali kavita hai yah.....aabhaar iske liye nikita
अच्छा लिखा है आपने। विषय का विवेचन और भाषिक संवेदना प्रभावित करती है।
मेरे ब्लाग पर राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के संदर्भ में अपील है। उसे पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया देकर बताएं कि राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने की दिशा में और क्या प्रयास किए जाएं।
मेरा ब्लाग है-
http://www.ashokvichar.blogspot.com
aapne apni bhavanao ko bahut achi tarah se wyakt kiya hai asha karta hu aage hume aur aisa kuch nahi padhna pade, balki isse kuch aur acha mile.. all d best, pona!!!!
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